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Wednesday, 25 April 2018

मधुमति मंत्र

ॐ अस्य मधुमति मंत्रस्य:, मधुवनस्पति देवता:, अथर्वा: ऋषये , अनुष्टुप छंद:, मधुरवाणीं प्राप्ति हेत्वे जपे विनियोग:

ओ३म् इ॒यं वी॒रुन्मधु॑जाता॒ मधु॑ना त्वा खनामसि । मधो॒रधि॒ प्रजा॑तासि॒ सा नो॒ मधु॑मतस्कृधि ॥
ओ३म् जि॒ह्वाया॒ अग्रे॒ मधु॑ मे जिह्वामू॒ले म॒धूल॑कम् । ममेदह॒ क्रता॒वसो॒ मम॑ चि॒त्तमु॒पाय॑सि ॥
ओ३म् मधु॑मन्मे नि॒क्रम॑णं॒ मधु॑मन्मे प॒राय॑णम् । वा॒चा व॑दामि॒ मधु॑मद्भू॒यासं॒ मधु॑संदृशः ॥
ओ३म् मधो॑रस्मि॒ मधु॑तरो म॒दुघा॒न्मधु॑मत्तरः । मामित्किल॒ त्वं वनाः॒ शाखां॒ मधु॑मतीमिव ॥
ओ३म् परि॑ त्वा परित॒त्नुने॒क्षुणा॑गा॒मवि॑द्विषे । यथा॒ मां क॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥

दुःख मोचन सूक्त



। ॐ अस्य दुःख मोचन सूक्तस्य, यम ऋषि:, दुःस्वप्ननाशन देवता:, यजुर्ब्राह्मी एकपदा अनुष्टुप्,त्रिपदा निचृत गायत्री,त्रिपदा प्राजापत्या छंद:, दुःख मोचन हेत्वे जपे विनियोग: ।

। ओ३म् जि॒तम॑स्माक॒मुद्भि॑न्नम॒स्माक॑मृ॒तम॒स्माकं॒ तेजो॒ ऽस्माकं॒ ब्रह्मा॒स्माकं॒ स्व॑र॒स्माकं॑ य॒ज्ञो॑३ ऽस्माकं॑ प॒शवो॒ ऽस्माकं॑ प्र॒जा अ॑स्माकं वी॒रा अ॒स्माक॑म् । तस्मा॑द॒मुं निर्भ॑जामो॒ ऽमुमा॑मुष्याय॒णम॒मुष्याः॑ पु॒त्रम॒सौ यः । स सर्व देवस्य: पाशा॒न्मा मो॑चि । तस्येदं वर्च॒स्तेजः॑ प्रा॒णमायु॒र्नि वे॑ष्टयामी॒दमे॑नमधराञ्चं पादयामि ॥

Sunday, 1 April 2018

॥ एकवीर सूक्त ॥


॥ एकवीर सूक्त ॥ (Become a Hero)

॥ ॐ अस्य: अथर्ववेदस्य, एकवीर: सूक्तस्य अप्रतिरथ: ऋषि:, त्रिष्टुप् भुरिक् त्रिष्टुप् छंद:, इन्द्र देवता:, एकवीर सिद्धि हेत्वे जपे विनियोग:

ओ३म् इन्द्र॑स्य बा॒हू स्थवि॑रौ॒ वृषा॑णौ चि॒त्रा इ॒मा वृ॑ष॒भौ पा॑रयि॒ष्णू । तौ यो॑क्षे प्रथ॒मो योग॒ आग॑ते॒ याभ्यां॑ जि॒तमसु॑राणां॒ स्व॑१र्यत् ॥
ओ३म् आ॒शुः शिशा॑नो वृष॒भो न भी॒मो घ॑नाघ॒नः क्षोभ॑णश्चर्षनीनाम् । सं॒क्रन्द॑नो ऽनिमि॒ष ए॑कवी॒रः श॒तं सेना॑ अजयत्सा॒कमिन्द्रः॑ ॥
ओ३म् स॒म्क्रन्द॑नेनानिमि॒षेण॑ जि॒ष्णुना॑यो॒ध्येन॑ दुश्च्यव॒नेन॑ धृ॒स्नुना॑ । तदिन्द्रे॑ण जयत॒ तत्स॑हध्वं॒ युधो॑ नर॒ इषु॑हस्तेन॒ वृष्णा॑ ॥
ओ३म् स इषु॑हस्तैः॒ स नि॑ष॒ङ्गिभि॑र्व॒शी संस्र॑ष्टा॒ स युध॒ इन्द्रो॑ ग॒णेन॑ । सं॑सृष्ट॒जित्सो॑म॒पा बा॑हुश॒र्ध्यु॒ग्रध॑न्वा॒ प्रति॑हिताभि॒रस्ता॑ ॥
ओ३म् ब॑लविज्ञा॒यः स्थवि॑रः॒ प्रवी॑रः॒ सह॑स्वान्वा॒जी सह॑मान उ॒ग्रः । अ॒भिवी॑रो अ॒भिष॑त्वा सहो॒जिज्जैत्र॑मिन्द्र॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ गो॒विद॑म् ॥
ओ३म् इ॒मं वी॒रमनु॑ हर्षध्वमु॒ग्रमिन्द्रं॑ सखायो॒ अनु॒ सं र॑भध्वम् । ग्रा॑म॒जितं॑ गो॒जितं॒ वज्र॑बाहुं॒ जय॑न्त॒मज्म॑ प्रमृ॒णन्त॒मोज॑सा ॥
ओ३म् अ॒भि गो॒त्राणि॒ सह॑सा॒ गाह॑मानो ऽदा॒य उ॒ग्रः श॒तम॑न्यु॒रिन्द्रः॑ । दु॑श्च्यव॒नः पृ॑तना॒षाड॑यो॒ध्यो॑३ ऽस्माकं॒ सेना॑ अवतु॒ प्र यु॒त्सु ॥
ओ३म् बृह॑स्पते॒ परि॑ दीया॒ रथे॑न रक्षो॒हामित्रा॑मप॒बाध॑मानः । प्र॑भ॒ञ्जं छत्रू॑न्प्रमृ॒णन्न॒मित्रा॑न॒स्माक॑मेध्यवि॒ता त॒नूना॑म् ॥
ओ३म् इन्द्र॑ एषां ने॒ता बृह॒स्पति॒र्दक्षि॑णा य॒ज्ञः पु॒र ए॑तु॒ सोमः॑ । दे॑वसे॒नाना॑मभिभञ्जती॒नां जय॑न्तीनां म॒रुतो॑ यन्तु॒ मध्ये॑ ॥
ओ३म् इन्द्र॑स्य॒ वृष्णो॒ वरु॑णस्य॒ राज्ञो॑ आदि॒त्यानां॑ म॒रुतां॒ शर्ध॑ उ॒ग्रम् । म॒हाम॑नसां भुवनच्य॒वानां॒ घोषो॑ दे॒वानां॒ जय॑ता॒मुद॑स्थात् ॥
ओ३म् अ॒स्माक॒मिन्द्रः॒ समृ॑तेषु ध्व॒जेष्व॒स्माक॒ष्या इष॑व॒स्ता ज॑यन्तु । अ॒स्माकं॑ वी॒रा उत्त॑रे भवन्त्व॒स्मान्दे॑वासो ऽवता॒ हवे॑षु ॥

॥ आत्मगोपन सूक्त ॥


॥ आत्मगोपन सूक्त



॥ ॐ अस्य: अथर्ववेदस्य आत्मगोपन सूक्तस्य अथर्वा: ऋषि:, जगती पथ्याबृहती संस्तारपङ्क्ति त्रिपदा विराट् गायत्री छंद:, इन्द्र देवता:, आत्मगोपन सिद्धि हेत्वे जपे विनियोग ॥

ओ३म् पा॒तं न॑ इन्द्रापूष॒णादि॑तिः पान्तु म॒रुतः॑ । अपां॑ नपात्सिन्धवः स॒प्त पा॑तन॒ पातु॑ नो॒ विष्णु॑रु॒त द्यौः ॥
ओ३म् पा॒तां नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒भिष्ट॑ये॒ पातु॒ ग्रावा॒ पातु॒ सोमो॑ नो॒ अंह॑सः । पातु॑ नो दे॒वी सु॒भगा॒ सर॑स्वती॒ पात्व॒ग्निः शि॒वा ये अ॑स्य पा॒यवः॑ ॥
ओ३म् पा॒ताम्नो॑ दे॒वाश्विना॑ शु॒भस्पती॑ उ॒षासा॒नक्तो॒त न॑ उरुष्यताम् । अपां॑ नपा॒दभि॑ह्रुती॒ गय॑स्य चि॒द्देव॑ त्वष्टर्व॒र्धय॑ स॒र्वता॑तये ॥
ओ३म् त्वष्टा॑ मे॒ दैव्यं॒ वचः॑ प॒र्जन्यो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ । पु॒त्रैर्भ्रातृ॑भि॒रदि॑ति॒र्नु पा॑तु नो दु॒ष्टरं॒ त्राय॑माणं॒ सहः॑ ॥
ओ३म् अंशो॒ भगो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मादि॑तिः॒ पान्तु॑ म॒रुतः॑ । अप॒ तस्य॒ द्वेषो॑ गमेदभि॒ह्रुतो॑ यावय॒च्छत्रु॒मन्ति॑तम् ॥
ओ३म् धि॒ये सम॑श्विना॒ प्राव॑तं न उरु॒ष्या ण॑ उरुज्म॒न्नप्र॑युछन् । द्यौ॑३ष्पित॑र्या॒वय॑ दु॒छुना॒ या ॥

Wednesday, 28 March 2018

स्वापन सूक्त


ॐ अस्य अर्थवेद मंत्रस्य: ब्रह्मा: ऋषि:, वृषभ, स्वापन देवता:, अनुष्टुप्, भुरिक् अनुष्टुप्, पुरस्तात् ज्योति त्रिष्टुप् छन्द:, सर्व स्वापन सिदधि हेत्वे जपे विनियोग:


मंत्र 

ओ३म् स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भो यः स॑मु॒द्रादु॒दाच॑रत् । तेना॑ सह॒स्ये॑ना व॒यं नि जना॑न्त्स्वापयामसि ॥
ओ३म् न भूमिं॒ वातो॒ अति॑ वाति॒ नाति॑ पश्यति॒ कश्च॒न । स्त्रिय॑श्च॒ सर्वाः॑ स्वा॒पय॒ शुन॒श्चेन्द्र॑सखा॒ चर॑न् ॥
ओ३म् प्रो॑ष्ठेश॒यास्त॑ल्पेश॒या नारी॒र्या व॑ह्य॒शीव॑रीः । स्त्रियो॒ याः पुण्य॑गन्धय॒स्ताः सर्वाः॑ स्वापयामसि ॥
ओ३म् एज॑देजदजग्रभं॒ चक्षुः॑ प्रा॒णम॑जग्रभम् । अङ्गा॑न्यजग्रभं॒ सर्वा॒ रात्री॑णामतिशर्व॒रे ॥
ओ३म् य आस्ते॒ यश्चर॑ति॒ यश्च॒ तिष्ठ॑न्वि॒पश्य॑ति । तेषां॒ सं द॑ध्मो॒ अक्षी॑णि॒ यथे॒दं ह॒र्म्यं तथा॑ ॥
ओ३म् स्वप्तु॑ मा॒ता स्वप्तु॑ पि॒ता स्वप्तु॒ श्वा स्वप्तु॑ वि॒श्पतिः॑ । स्वप॑न्त्वस्यै ज्ञा॒तयः॒ स्वप्त्व॒यम॒भितो॒ जनः॑ ॥
ओ३म् स्वप्न॑ स्वप्नाभि॒कर॑णेन॒ सर्वं॒ नि स्वा॑पया॒ जन॑म् । ओ॑त्सू॒र्यम॒न्यान्त्स्वा॒पया॑व्यु॒षं जा॑गृताद॒हमिन्द्र॑ इ॒वारि॑ष्टो॒ अक्षि॑तः ॥

Thursday, 16 November 2017

आंजन सूक्त (spiritual)

ॐ अस्य अथर्ववेदस्य आञ्जन सूक्तस्य,  भृगुऋषये,   अञ्जन, मन्त्रोक्त देवता:,   अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, एकावसानाविराट्महाबृहती,एकावसाना निचृत महाबृहती छंद:,   अदॄ‌‍‍‌ष्ट दर्शनार्थे जपे विनियोग:

ऋ॒णादृ॒णमि॑व॒ सं न॑य कृ॒त्यां कृ॑त्या॒कृतो॑ गृ॒हम् । चक्षु॑र्मन्त्रस्य दु॒र्हार्दः॑ पृ॒ष्टीरपि॑ शृणाञ्जन ॥ 
ओ३म् यद॒स्मासु॑ दु॒ष्वप्न्यं॒ यद्गोषु॒ यच्च॑ नो गृ॒हे । अना॑मग॒स्तं च॑ दु॒र्हार्दः॑ प्रि॒यः प्रति॑ मुञ्चताम् ॥ 
ओ३म् अ॒पामू॒र्ज ओज॑सो वावृधा॒नम॒ग्नेर्जा॒तमधि॑ जा॒तवे॑दसः चतु॑र्वीरं पर्व॒तीयं॒ यदाञ्ज॑नं॒ दिशः॑ प्रदिशः कर॒दिच्छि॒वास्ते॑ ॥ 
ओ३म् चतु॑र्वीरं बध्यत॒ आञ्ज॑नं ते॒ सर्वा॒ दिशो॒ अभ॑यास्ते भवन्तु । ध्रु॒वस्ति॑ष्ठासि सवि॒तेव॒ चार्य॑ इ॒मा विशो॑ अ॒भि ह॑रन्तु ते ब॒लिम् ॥ 
ओ३म् आक्ष्वैकं॑ म॒णिमेकं॑ क्र्णुष्व स्ना॒ह्येके॒ना पि॒बैक॑मेषाम् । चतु॑र्वीरं नैरृ॒तेभ्य॑श्च॒तुर्भ्यो॒ ग्राह्या॑ ब॒न्धेभ्यः॒ परि॑ पात्व॒स्मान् ॥ 
ओ३म् अ॒ग्निर्मा॒ग्निना॑वतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से । तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥ 
ओ३म् इन्द्रो॑ मेन्द्रि॒येणा॑वतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से । तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥ 
ओ३म् सोमो॑ मा॒ सौम्ये॑नावतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से । तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥ 
ओ३म् भगो॑ म॒ भगे॑नावतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से । तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥ 
ओ३म् म॒रुतो॑ मा ग॒णैर॑वन्तु प्रा॒णाया॑पा॒नायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से॒ तेज॑से । स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥



अस्तु






Friday, 10 November 2017

स्त्री गुरु यन्त्र और शक्ति गुरु यन्त्र





॥स्त्री गुरु यन्त्र॥

॥मंत्र॥

 ॥ॐ स्त्रीम गुरुस्वारुपाय नमः॥


॥यहा स्त्री का मतलब पत्नी नहि है, और गुरु के उस स्वरुप में भी नहीं हैं जैसे की गुरु को अधिकतम समझा जाता हैं ‍‌‍॥ यहाँ स्त्रीगुरु वामदेवी के रूप में हैं ‍‌। या यह एक भुतिनी या इतर योनी की तरह हैं ।





॥शक्ति गुरु यन्त्र॥

॥ॐ शक्तिम गुरुस्वारुपाय नमः ॥








भु विल्व , व्यवहार सिद्दी यन्त्र, कुबेर यन्त्र ( पूजा कर्म रूपी आजीविका प्राप्ति यन्त्र )





भू विल्व दर्शन यन्त्र


॥ ओउम भू विल्वं दृष्शय दृष्शय भू गह्वरं दृष्शयदृष्शय बहुजन प्रजा दर्शय दर्शय संगती सिद्दाय विसरय विसरय 
प्रसरय प्रसरय नमः॥


व्यवहार सिद्दी यन्त्र

॥ ओउम समस्त व्यवहार प्राप्ताय नमः‌‍ ॥








कुबेर यन्त्र ( पूजा कर्म रूपी आजीविका प्राप्ति यन्त्र )



॥ ॐ कुबेराय साधना स्थली प्राप्ताय ॐ ॥














Tuesday, 7 November 2017

दिव्य लोक एवं सूक्ष्म लोक प्रवेश यन्त्र




दिव्य लोक एवं  सूक्ष्म लोक प्रवेश यन्त्र


।। ॐ ह्रीं ॐ ह्रीं ॐ ह्रीं ॐ उड्डय उड्डय मम जीवं शरीर बाह्य निकासय निकासय सूक्ष्म शरीर धरणाय इदम शरीरम सर्वत्र संचरय, उड्डय, दिव्य लोकम प्रवेशय, दृष्ट्य, कल्पना मध्ये दृष्टिगत व्यक्ति स्थान  लोकेन मनोवांछित भोतिक वस्तुम प्राप्तय प्राप्तय ह्रीं  ॐ ह्रीं ॐ ह्रीं ॐ स्थायित्वं स्थायित्वं स्थायित्वं ॐ ह्रीं ॐ ह्रीं ॐ ह्रीं ॐ ।।

जप कम से कम तीन दिन एक माला, पूर्ण ब्रह्मचर्य , और साधना के  नियम को कठोरता के साथ करें ।
और सोते हुवे आप कभी भी अपने शरीर से बाहर निकल जायेंगे, इसमें कोई कठोर योग साधना की जरुरत नहीं हैं । इसमें आप किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में भी प्रवेश कर सकते हैं । और अगर कोई जो बिना किसी चोट के मृत्यु को प्राप्त हुआ जैसे पानी में डूब कर तो आप बिना उसके पास गए भी उसके शरीर में प्रवेश कर सकते हैं ।
वस्तुत यह पूरा  परकाया प्रवेश से सम्बंधित प्रयोग नहीं हैं । पर इसके बहुत और भी अनुभव हैं l जो दिव्य लोको में किसी के प्रवेश की स्थितियों की  बहुत सी रचनायों को सामने लाता हैं । 



गुरुत्व पीठ यन्त्र ( Gurutv pith yantra )




पंचदशी यन्त्र सूर्य का यन्त्र हैं यह यन्त्र संख्या 1 से प्रारम्भ होता हैं | जैसे नवकोष्ठोमें प्रथम से प्रारम्भ करें तो २ ९ ४ ,७ ५ ३ , ६ १ ८ इस तरह से और सब तरह से इसका योग 15 होता हैं | पंचदशी यन्त्र में यदि १ जोड़ दिया जाएँतो यह चन्द्र का यन्त्रबन जायेगा और इसी तरह क्रमश: सब ग्रहों कें यन्त्र बनेगें | नवकोष्ठोसे प्रारम्भ होने वाले किसी भी यन्त्र जिसका प्रत्येक ओर से योग एक समान आये वह आठ तरीके से बनाया जा सकता हैं |

पंचदशी यन्त्र जो कि 1 से प्रारम्भ होता हैं उसमे अगर 1 घटा दिया जाये तो जो यन्त्र बनेगा वो 0 से प्रारम्भ होगा
और इस तरह से 0 से प्रारम्भ होने वाले आठ यन्त्र बनेगें | उन्ही में से एक यन्त्र हैं गुरु सायुज्य यन्त्र इस यन्त्र की साधना से आप अपने गुरु को अपने आज्ञा चक्र पर अनुभव कर पायेगें |

मंत्र || ॐ ह्रीं गुरुत्व पीठाय ह्रीं ॐ ||

जप संख्या 5 माला
इस मंत्र को आप यन्त्रके साथ ही लिख सकतें हैं | कुमकुम हल्दीसे कार्ड पेपर पर यह यन्त्र बना लिजियें |इस यन्त्र को अंगूठी में बनवा कर तर्जनी या अंगूठे में पहना जा सकता हैं | मंत्र को भी यन्त्र के साथ लिखाजा सकता हैं |