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Saturday, 2 December 2017

पाशुपतास्त्र मंत्र

पाशुपतास्त्र मंत्र



मंत्र - ऊँ श्लीं पशु हुं फट्।


विनियोग :- ऊँ अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छंदः, पशुपतास्त्ररूप पशुपति देवता, सर्वत्र यशोविजय लाभर्थे जपे विनियोगः।

षडंग्न्यास :- ऊँ हुं फट् ह्रदयाय नमः। श्लीं हुं फट् शिरसे स्वाहा। पं हुं फट् शिखायै वष्ट्। शुं हुं फट् कवचाय हुं। हुं हुं फट् नेत्रत्रयाय वौष्ट्। फट् हुं फट् अस्त्राय फट्।

ध्यान:-
मध्याह्नार्कसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्जवलम् त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रु-स्फुरन्मूर्द्धजम्। हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्तिदधानं विभुम् दंष्ट्रभीम चतुर्मुखं पशुपतिं दिव्यास्त्ररूपं स्मरेत्।।

मालामंत्र

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे।
ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट। हूंकारास्त्राय फट। वज्र हस्ताय फट। शक्तये फट। दण्डाय फट। यमाय फट। खडगाय फट। नैऋताय फट। वरुणाय फट। वज्राय फट। पाशाय फट। ध्वजाय फट। अंकुशाय फट। गदायै फट। कुबेराय फट। त्रिशूलाय फट। मुदगराय फट। चक्राय फट। पद्माय फट। नागास्त्राय फट। ईशानाय फट। खेटकास्त्राय फट। मुण्डाय फट। मुण्डास्त्राय फट। काड्कालास्त्राय फट। पिच्छिकास्त्राय फट। क्षुरिकास्त्राय फट। ब्रह्मास्त्राय फट। शक्त्यस्त्राय फट। गणास्त्राय फट। सिद्धास्त्राय फट। पिलिपिच्छास्त्राय फट। गंधर्वास्त्राय फट। पूर्वास्त्रायै फट। दक्षिणास्त्राय फट। वामास्त्राय फट। पश्चिमास्त्राय फट। मंत्रास्त्राय फट। शाकिन्यास्त्राय फट। योगिन्यस्त्राय फट। दण्डास्त्राय फट। महादण्डास्त्राय फट। नमोअस्त्राय फट। शिवास्त्राय फट। ईशानास्त्राय फट। पुरुषास्त्राय फट। अघोरास्त्राय फट। सद्योजातास्त्राय फट। हृदयास्त्राय फट। महास्त्राय फट। गरुडास्त्राय फट। राक्षसास्त्राय फट। दानवास्त्राय फट। क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट। त्वष्ट्रास्त्राय फट। सर्वास्त्राय फट। नः फट। वः फट। पः फट। फः फट। मः फट। ह्रीं: फट। पेः फट। भूः फट। भुवः फट। स्वः फट। महः फट। जनः फट। तपः फट। सत्यं फट। सर्वलोक फट। सर्वपाताल फट। सर्वतत्व फट। सर्वप्राण फट। सर्वनाड़ी फट। सर्वकारण फट। सर्वदेव फट। ह्रीं फट। क्लीं फट। डूं फट। स्त्रुं फट। स्वां फट। लां फट। वैराग्याय फट। मायास्त्राय फट। कामास्त्राय फट। क्षेत्रपालास्त्राय फट। हुंकरास्त्राय फट। भास्करास्त्राय फट। चंद्रास्त्राय फट। विघ्नेश्वरास्त्राय फट। गौः गां फट। स्त्रों स्त्रौं फट। हौं हों फट। भ्रामय भ्रामय फट। संतापय संतापय फट। छादय छादय फट। उन्मूलय उन्मूलय फट। त्रासय त्रासय फट। संजीवय संजीवय फट। विद्रावय विद्रावय फट। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट।

अस्तु

Thursday, 30 November 2017

रत्न प्राप्ति

कल्पन्ताम् सूक्त, रत्नवान् धनवानात्मा देवता



। ॐ अस्य यजुर्वेद्स्य कल्पन्ताम् सूक्तंस्य, देवा ऋषयः, रत्नवान् धनवानात्मा देवता, भुरिगतिशक्वरी छन्द: , धनरत्न  प्राप्ति हेतेवे जप करिस्यामी ।

मंत्र

। ओ३म् अश्मा॑ च मे॒ मृत्ति॑का च मे गि॒रय॑श्च मे॒ पर्व॑ताश्च मे॒ सिक॑ताश्च मे॒ वन॒स्पत॑यश्च मे॒ हिर॑ण्यञ्च॒ मे य॑श्च मे श्या॒मञ्च॑ मे लो॒हञ्च॑ मे॒ सीस॑ञ्च मे॒ त्रपु॑ च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥


रत्न प्राप्ति का मतलब धन प्राप्ति की विधि का ज्ञान भी हैं ।

अस्तु !




Wednesday, 29 November 2017

नष्ट द्रव्य प्राप्ति सूक्त

॥ नष्ट द्रव्य प्राप्ति सूक्तम् ॥

ॐ अस्य नष्ट द्रव्य प्राप्ति सूक्त मंत्रस्य, भारद्वाज बार्हस्पत्य ऋषि: , गायत्री छन्द:, पूषा देवता:
नष्ट द्रव्य प्राप्ति हेतवे जप करिष्यामि ।

मन्त्र

सं पू॑षन्वि॒दुषा॑ नय॒ यो अञ्ज॑सानु॒शास॑ति । य ए॒वेदमिति॒ ब्रव॑त् ॥ समु॑ पू॒ष्णा ग॑मेमहि॒ यो गृ॒हाँ अ॑भि॒शास॑ति । इ॒म ए॒वेति॑ च॒ ब्रव॑त् ॥ पू॒ष्णश्च॒क्रं न रि॑ष्यति॒ न कोशोऽव॑ पद्यते । नो अ॑स्य व्यथते प॒विः ॥ यो अ॑स्मै ह॒विषावि॑ध॒न्न तं पू॒षापि॑ मृष्यते । प्र॒थ॒मो वि॑न्दते॒ वसु॑ ॥ पू॒षा गा अन्वे॑तु नः पू॒षा र॑क्ष॒त्वर्व॑तः । पू॒षा वाजं॑ सनोतु नः ॥ पूष॒न्ननु॒ प्र गा इ॑हि॒ यज॑मानस्य सुन्व॒तः । अ॒स्माकं॑ स्तुव॒तामु॒त ॥ माकि॑र्नेश॒न्माकीं॑ रिष॒न्माकीं॒ सं शा॑रि॒ केव॑टे । अथारि॑ष्टाभि॒रा ग॑हि ॥ शृ॒ण्वन्तं॑ पू॒षणं॑ व॒यमिर्य॒मन॑ष्टवेदसम् । ईशा॑नं रा॒य ई॑महे ॥ पूष॒न्तव॑ व्र॒ते व॒यं न रि॑ष्येम॒ कदा॑ च॒न । स्तो॒तार॑स्त इ॒ह स्म॑सि ॥ परि॑ पू॒षा प॒रस्ता॒द्धस्तं॑ दधातु॒ दक्षि॑णम् । पुन॑र्नो न॒ष्टमाज॑तु ॥

नष्ट द्रव्य कई तरह का हो सकता हैं

गड़ा हुआ धन ।
किसी का कहीं गिरा हुआ धन जो मिल नहीं रहा हों, अपने घर में ।
या ऐसा धन जो आप किसी को देकर भूल गएँ हो ।
या आप कहीं रास्तें में जाएँ या कही मीना बाज़ार में तो वहां भी बहुत कुछ गिर सकतां हैं तो वो आपको दृष्टगत हो जाएँ ( नहीं तो कचरे में भी जा सकता हैं ) ।
आप का पूर्वार्जित ज्ञान, विद्यां या व्यवहार जो अब काम आ जाएँ ।

सोम्य प्रयोग

धन प्रदायक ऋषियों में भृगु ऋषि उत्तम हैं , भृगु, लक्ष्मी और शुक्र  के पिता भी हैं । भृगु ऋषि का चित्र लगा कर आप उपरोक्त सूक्त को नित्य पांच बार भी बोलतें हैं तो आप को ऐसा धन आपको नज़र नहीं आ रहा हैं वो मिलेगा। (सिर्फ ५ या ६ दिन में )


तंत्र प्रयोग

माता वैष्णो देवी और बाबा अमरनाथ का फोटो लगाए ।

घी का दीप जलाएं ( साइड वाली लो नहीं होनी चाहियें मतलब ऐसी बत्ती जो दीपक के किनारे को न छूती हो,।
दीप की लो में कालिख नहीं होनी चाहियें, वो साफ और स्पस्ट होनी चाहियें, यह आपको देखना हैं )।

अब आपको एक संकल्प लेना हैं की में तिन या पांच दिन इस मंत्र के जप करूंगा ( कम से कम तिन दिन अधिक से अधिक सात दिन ) ( जप संख्या कम से कम 31 बार ज्यादा से ज्यादा 108 बार )

किसी भी दिन इसको प्रारम्भ करें ।
एक बार जिस स्थान और समय पर आप इसे करें वापस उसी जगह और स्थान पर आपको प्रतिदिन करना हैं ।
और संकल्प पूरा होने के बाद आपको किसी भी दिन स्वप्न में वह संकेत मिल सकता हैं । जिससे आप को नष्ट या अदृष्ट धन की प्राप्ति हो सकती हैं ।(स्वप्न में संकेत बहुत ही साधारण तरीकें से मिल सकतें हैं जैसे आपकी १० मिनिट के लिए आँख लग जाएँ चाहे आप घर पर हो या कहीं और तो आपको कुछ दिख सकता हैं । संकेत इतने साधारण तरीके से भी हो सकता हैं की आपको याद ही ना रहें । यह सब आपको देखना हैं ।)

अंत में बात ये हैं की एक २००० का नोट सड़क पर अगर पड़ा हो तो भीड़ भरे बाज़ार में भी उस पर सिर्फ आपकी नज़र पड़े ।

यहाँ आपको क्या अनुभव होते, ये आप जरूर बताएं

Tuesday, 28 November 2017

OUIJA BOARD


OUIJA BOARD


OUIJA BOARD को इस्तेमाल करने से पहले हनुमान जी के एक चित्र पर 11 बार हनुमान चालीसा करें 
और उसे ढँक कर रख दे और कोई शेतानी आत्मा आने पर उस तस्वीर को हाथ में ले लेवें ।
या अपने मित्र को जिसने उस दिन ११ बार हनुमान चालीसा की हो । उसको दुसरे कमरे में रहने के लियें कहें और कोई संकट आने पर उसे बुलावें ।

जिस कमरे में आप OUIJA BOARD प्रयोग कर रहें हैं । उसमे कोई और देवता की तस्वीर या कोई अन्य देवता से संबंधित चीज़ नहीं होनी चाहिए । वर्ना कोई प्रत्यक्षीकरण नहीं होगा ।


पश्चिम मे लोग आत्माओ को बुलाने के लिये OUIJA BOARD का इस्तेमाल करते हैं ।
ENGLISH भाषा जो आज संसार भर में विस्तारित हैं । और जिस लोक की ये भाषा हैं उस लोक का जो स्पंदन हैं, और जो मायावी शक्तिया हैं वो भी इसके अन्दर में हैं ।


अगर आप इस OUIJA BOARD के प्रयोग करना चाहें तो इसको प्रिंट करां कर लेमिनेशन करा ले या किसी लकड़ी की चोकी पर जो थोड़ी चिकनी हो उस पर काले मोटे ब्रश से काले कलर से बना लेवें । OUIJA BOARD स्पष्ट बनाना चाहिये । सही यही रहता हैं की आप उसको प्रिंट करा कर लेमिनेशन करा ले । एक लकड़ी का टुकड़ा जिसमे फिसलने के लियें निचे सनमाइका लगा हो उसके बिच में एक छेद कर लेवें ।
और उसे मार्कर की तरह उपयोग करें ।



 समय रात्रि 1.४५ के बाद  और ३.१५ तक 





इस साधना में कठोर ब्रह्मचर्य अनिवार्य हैं ।


Sunday, 26 November 2017

विष्णु दशावतार स्तोत्र ( wealth in share market )



शेयर बाज़ार में आपका पैसा रुका हुवा हैं तो विष्णु दशावतार स्तोत्र का पाठ आपका रुका हुवां धन दिला सकता हैं । विष्णु का जगत में जो नियोग हैं । एक के बाद एक अवतार ये एक शेयर या अंश की तरह हैं । जो निरंतर विकसित क्रम मैं हैं । मतलब एक अवतार के बाद एक अवतार विकसित क्रम में, निरंतर विकास की और ।
में शेयर बाज़ार से दुरी बनाए रखने में ही भलाई समझता था । इसके पांच पाठ रोज़ाना के बाद मेने DMAT अकाउंट खुलवाया और उसी समय (2009) COAL INDIA का आफर बाज़ार में आया हुआ था । मैंने पैसे लगाए और लाभ प्राप्त किया  और सभी ने इसमें लाभ प्राप्त किया था ।

॥ विष्णु दशावतार स्तोत्र ॥

ॐ आदाय वेदान सकलान समुद्रान्निहत्यम शंखं रिपुमत्य उग्रं ।
दप्ताय पूरा येन पितामहाय विष्णुम तमाद्य भज मत्स्यरूपम ॥
दिव्यामृतार्थ मथिते महाब्धौ देवासुरेर्वासुकी मंदराद्यै:।
भुमेर्महावेग विघुर्णितायास्त कुर्ममाधारगतम् स्मरामि ॥
समुद्रकांची सरिदुत्तरिया वसुंधरा मेरुकिरीटभारा ।
दंष्ट्राग्रतो येन समुधृता भूस्तामादिकोलम शरणम प्रपद्ये ॥
भक्तार्तिभंगक्षमया धिया य: स्तम्भान्तरालादूदितो नृसिंहम ।
रिपुसुराणा निशितैर्नखाग्रेर्विदारयंत न च विस्मरामि ॥
चतुसमुद्राभरणाधरीत्री न्यासाय नालं चरणस्य यस्य ।
एकस्य नान्यस्य पदम् सुराणा त्रिविक्रमं सर्वगतम नमामि ॥
त्रि:सप्तकृत्वो नृपतिन्निहत्य यस्तर्पणं रक्तमय पितृभ्यं:।
चकार दोर्दंडबलेन सम्यक तमआदिशूर प्रणमामी रामम ॥
कुले रघुणा समवाप्य जन्म विधाय सेतुम जल्धेर्जलांत: ।
लंकेश्वरं य: समयांचकार सीतापतिम तं प्रणमामि भक्त्या ॥
हलेन सर्वानसुराननिकृश्य चकार चूर्ण मुसल प्रहारै: ।
य: कृष्णमासाध्य बलम बलियान भक्त्या भजे तम बलभद्र रामम ॥
पूरासुराणामसुरन्विजेतूं समभावयनछ्रीवर चिन्हवेशम ।
चकार य: शास्त्रममोघकल्पम तम मुल्भूतम प्रणतोस्मि बुद्धम् ॥
कल्पावसाने निखिल: सुरै: स्वै: संघट्टयामास निमेषमात्रात् ।
यस्य तेजसा स्वेन ददाह भीमो विष्णवात्मकं तं तुरंग भजाम् ॥

शंखम सुचक्रं सुगदाम् सरोजम् दोर्भिर्दधानम् गरुडाधिरूढम् ।
लक्ष्मीवत्स चिन्हम् जगदादिमूलं तमालनीलं हृदि विष्णुमीडे ॥
क्षीराम्बुधो शेषविशेषकल्पे श्यानमन्त: स्मित्शोभीवक्त्रं ।
उत्फुल्लनेत्राम्बुजमम्बुदाभमाद्यं श्रुतीनामसकृत्स्मरामि ॥

प्रीणयेदनया स्तुत्या जगन्नाथं जगन्मयम् ।
धर्मार्थ काम मोक्षाणामाप्तये पुरुषोत्तमम् ॥

इस स्तोत्र से आपको पूर्वजो की सम्पति भी प्राप्त हो सकती हैं । या कोई रिश्तेदार आपके नाम अपनी कुछ सम्पति या सारी सम्पति कर सकता हैं ।
बुधवार से शनिवार इस स्तोत्र का पाठ नील वस्त्र पहन कर करें बाकी रवि, सोम और मंगल को श्वेत वस्त्र पहन कर इस स्तोत्र का पाठ करें ।

स्वप्न संकेत
इसमें आपको स्वप्न में आपका बड़ा भाई या दोस्त जो आपसे उमर में बड़ा हो अपना स्तंभित लिंग हाथ में लियें दिखाई देगा । यह शेयर बाज़ार में लाभ सम्बंधी स्वप्न में संकेत हैं । ये जूंआ, सट्टा और लाटरी के द्वारा भी धन प्राप्ति का संकेत हैं ।


अपराजिता ( The undefeated )

त्रैलोक्यविजया अपराजितास्तोत्रम् ।

ॐ नमोऽपराजितायै ।
ॐ अस्या वैष्णव्याः पराया अजिताया महाविद्यायाः वामदेव-बृहस्पति-मार्केण्डेया ऋषयः ।गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती छन्दांसि । लक्ष्मीनृसिंहो देवता । ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं बीजम् ।हुं शक्तिः ।
सकलकामनासिद्ध्यर्थं अपराजितविद्यामन्त्रपाठे विनियोगः ।

ॐ निलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणान्विताम् ।
शुद्धस्फटिकसङ्काशां चन्द्रकोटिनिभाननाम् ॥ १॥
शङ्खचक्रधरां देवी वैष्ण्वीमपराजिताम्
बालेन्दुशेखरां देवीं वरदाभयदायिनीम् ॥ २॥

नमस्कृत्य पपाठैनां मार्कण्डेयो महातपाः ॥ ३॥ मार्ककण्डेय उवाच - शृणुष्वं मुनयः सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम् ।
असिद्धसाधनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम् ॥ ४॥

(1) मंत्र

ॐ नमो नारायणाय, नमो भगवते वासुदेवाय, नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रशीर्षायणे, क्षीरोदार्णवशायिने, शेषभोगपर्य्यङ्काय, गरुडवाहनाय, अमोघाय अजाय अजिताय पीतवाससे, ॐ वासुदेव सङ्कर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, हयग्रिव, मत्स्य कूर्म्म, वाराह नृसिंह, अच्युत, वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर राम राम राम । वरद, वरद, वरदो भव, नमोऽस्तु ते, नमोऽस्तुते, स्वाहा, ॐ असुर-दैत्य-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच-कूष्माण्ड- सिद्ध-योगिनी-डाकिनी-शाकिनी-स्कन्दग्रहान्उपग्रहान्नक्षत्रग्रहांश्चान्या हन हन पच पच मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय विद्रावय विद्रावय चूर्णय चूर्णय शङ्खेन चक्रेण वज्रेण शूलेन गदया मुसलेन हलेन भस्मीकुरु कुरु स्वाहा । ॐ सहस्रबाहो सहस्रप्रहरणायुध, जय जय, विजय विजय, अजित, अमित, अपराजित, अप्रतिहत, सहस्रनेत्र, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल, विश्वरूप बहुरूप, मधुसूदन, महावराह, महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण, पद्मनाभ, गोविन्द, दामोदर, हृषीकेश, केशव, सर्वासुरोत्सादन, सर्वभूतवशङ्कर,  सर्वदुःस्वप्नप्रभेदन, सर्वयन्त्रप्रभञ्जन, सर्वनागविमर्दन, सर्वदेवमहेश्वर, सर्वबन्धविमोक्षण,सर्वाहितप्रमर्दन, सर्वज्वरप्रणाशन, सर्वग्रहनिवारण, सर्वपापप्रशमन, जनार्दन, नमोऽस्तुते स्वाहा । विष्णोरियमनुप्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा । सर्वसौभाग्यजननी सर्वभीतिविनाशिनी ॥ ५॥

सर्वैंश्च पठितां सिद्धैर्विष्णोः परमवल्लभा । नानया सदृशं किङ्चिद्दुष्टानां नाशनं परम् ॥ ६॥
विद्या रहस्या कथिता वैष्णव्येषापराजिता ।पठनीया प्रशस्ता वा साक्षात्सत्त्वगुणाश्रया ॥ ७॥


ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ ८॥

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ह्यभयामपराजिताम् । या शक्तिर्मामकी वत्स रजोगुणमयी मता ॥ ९॥
सर्वसत्त्वमयी साक्षात्सर्वमन्त्रमयी च या ।या स्मृता पूजिता जप्ता न्यस्ता कर्मणि योजिता ।
सर्वकामदुधा वत्स शृणुष्वैतां ब्रवीमि ते ॥ १०॥ य इमामपराजितां परमवैष्णवीमप्रतिहतां पठति सिद्धां स्मरति सिद्धां महाविद्यां जपति पठति शृणोति स्मरति धारयति कीर्तयति वा न तस्याग्निवायुवज्रोपलाशनिवर्षभयं,
न समुद्रभयं, न ग्रहभयं, न चौरभयं, न शत्रुभयं, न शापभयं वा भवेत् ।क्वचिद्रात्र्यन्धकारस्त्रीराजकुलविद्वेषि-विषगरगरदवशीकरण- विद्वेष्णोच्चाटनवधबन्धनभयं वा न भवेत् । एतैर्मन्त्रैरुदाहृतैः सिद्धैः संसिद्धपूजितैः ।

(२) मंत्र
 ॐ नमोऽस्तुते ।अभये, अनघे, अजिते, अमिते, अमृते, अपरे, अपराजिते, पठति, सिद्धे जयति सिद्धे, स्मरति सिद्धे, एकोनाशीतितमे, एकाकिनि, निश्चेतसि, सुद्रुमे, सुगन्धे, एकान्नशे, उमे ध्रुवे, अरुन्धति, गायत्रि, सावित्रि, जातवेदसि, मानस्तोके, सरस्वति, धरणि, धारणि, सौदामनि, अदिति, दिति, विनते, गौरि, गान्धारि, मातङ्गी कृष्णे, यशोदे, सत्यवादिनि, ब्रह्मवादिनि, कालि, कपालिनि, करालनेत्रे, भद्रे, निद्रे, सत्योपयाचनकरि, स्थलगतं जलगतं अन्तरिक्षगतं वा मां रक्ष सर्वोपद्रवेभ्यः स्वाहा ।


यस्याः प्रणश्यते पुष्पं गर्भो वा पतते यदि । म्रियते बालको यस्याः काकवन्ध्या च या भवेत् ॥ ११॥
धारयेद्या इमां विद्यामेतैर्दोषैर्न लिप्यते । गर्भिणी जीववत्सा स्यात्पुत्रिणी स्यान्न संशयः ॥ १२॥
भूर्जपत्रे त्विमां विद्यां लिखित्वा गन्धचन्दनैः । एतैर्दोषैर्न लिप्येत सुभगा पुत्रिणी भवेत् ॥ १३॥
रणे राजकुले द्यूते नित्यं तस्य जयो भवेत् । शस्त्रं वारयते ह्योषा समरे काण्डदारुणे ॥ १४॥
गुल्मशूलाक्षिरोगाणां क्षिप्रं नाश्यति च व्यथाम् ॥ शिरोरोगज्वराणां न नाशिनी सर्वदेहिनाम् ॥ १५॥
इत्येषा कथिता विध्या अभयाख्याऽपराजिता । एतस्याः स्मृतिमात्रेण भयं क्वापि न जायते ॥ १६॥
नोपसर्गा न रोगाश्च न योधा नापि तस्कराः । न राजानो न सर्पाश्च न द्वेष्टारो न शत्रवः ॥१७॥
यक्षराक्षसवेताला न शाकिन्यो न च ग्रहाः । अग्नेर्भयं न वाताच्व न स्मुद्रान्न वै विषात् ॥ १८॥
कार्मणं वा शत्रुकृतं वशीकरणमेव च । उच्चाटनं स्तम्भनं च विद्वेषणमथापि वा ॥ १९॥
न किञ्चित्प्रभवेत्तत्र यत्रैषा वर्ततेऽभया । पठेद् वा यदि वा चित्रे पुस्तके वा मुखेऽथवा ॥ २०॥
हृदि वा द्वारदेशे वा वर्तते ह्यभयः पुमान् । हृदये विन्यसेदेतां ध्यायेद्देवीं चतुर्भुजाम् ॥ २१॥
रक्तमाल्याम्बरधरां पद्मरागसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशाभयवरैरलङ्कृतसुविग्रहाम् ॥ २२॥
साधकेभ्यः प्रयच्छन्तीं मन्त्रवर्णामृतान्यपि । नातः परतरं किञ्चिद्वशीकरणमनुत्तमम् ॥ २३॥
रक्षणं पावनं चापि नात्र कार्या विचारणा । प्रातः कुमारिकाः पूज्याः खाद्यैराभरणैरपि । तदिदं वाचनीयं स्यात्तत्प्रीत्या प्रीयते तु माम् ॥ २४॥

 ॐ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि विद्यामपि महाबलाम् ।
सर्वदुष्टप्रशमनीं सर्वशत्रुक्षयङ्करीम् ॥ २५॥ दारिद्र्यदुःखशमनीं दौर्भाग्यव्याधिनाशिनीम् । भूतप्रेतपिशाचानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ॥ २६॥ डाकिनी शाकिनी-स्कन्द-कूष्माण्डानां च नाशिनीम् । महारौद्रिं महाशक्तिं सद्यः प्रत्ययकारिणीम् ॥ २७॥ गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वस्वं पार्वतीपतेः । तामहं ते प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु ॥ २८॥
एकान्हिकं द्व्यन्हिकं च चातुर्थिकार्द्धमासिकम् । द्वैमासिकं त्रैमासिकं तथा चातुर्मासिकम् ॥ २९॥
पाञ्चमासिकं षाङ्मासिकं वातिक पैत्तिकज्वरम् । श्लैष्पिकं सात्रिपातिकं तथैव सततज्वरम् ॥ ३०॥
मौहूर्तिकं पैत्तिकं शीतज्वरं विषमज्वरम् । द्व्यहिन्कं त्र्यह्निकं चैव ज्वरमेकाह्निकं तथा । क्षिप्रं नाशयेते नित्यं स्मरणादपराजिता ॥ ३१॥

(3) मंत्र

ॐ हॄं हन हन, कालि शर शर, गौरि धम्, धम्, विद्ये आले ताले माले गन्धे बन्धे पच पच विद्ये नाशय नाशय पापं हर हर संहारय वा दुःखस्वप्नविनाशिनि कमलस्तिथते विनायकमातः रजनि सन्ध्ये, दुन्दुभिनादे, मानसवेगे, शङ्खिनि, चाक्रिणि गदिनि वज्रिणि शूलिनि अपमृत्युविनाशिनि विश्वेश्वरि द्रविडि द्राविडि द्रविणि द्राविणि
केशवदयिते पशुपतिसहिते दुन्दुभिदमनि दुर्म्मददमनि । शबरि किराति मातङ्गि ॐ द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं क्रं तुरु तुरु ॐ द्रं कुरु कुरु । ये मां द्विषन्ति प्रत्यक्षं परोक्षं वा तान् सर्वान्दम दम मर्दय मर्दय तापय तापय गोपय गोपय
पातय पातय शोषय शोषय उत्सादय उत्सादय ब्रह्माणि वैष्णवि माहेश्वरि कौमारि वाराहि नारसिंहि
ऐन्द्रि चामुण्डे महालक्ष्मि वैनायिकि औपेन्द्रि आग्नेयि चण्डि नैरृति वायव्ये सौम्ये ऐशानि ऊर्ध्वमधोरक्ष प्रचण्डविद्ये इन्द्रोपेन्द्रभगिनि । ॐ नमो देवि जये विजये शान्ति स्वस्ति-तुष्टि पुष्टि- विवर्द्धिनि ।
कामाङ्कुशे कामदुधे सर्वकामवरप्रदे । सर्वभूतेषु मां प्रियं कुरु कुरु स्वाहा । आकर्षणि आवेशनि-, ज्वालामालिनि-, रमणि रामणि, धरणि धारिणि, तपनि तापिनि, मदनि मादिनि, शोषणि सम्मोहिनि ।
नीलपताके महानीले महागौरि महाश्रिये । महाचान्द्रि महासौरि महामायूरि आदित्यरश्मि जाह्नवि ।
यमघण्टे किणि किणि चिन्तामणि । सुगन्धे सुरभे सुरासुरोत्पन्ने सर्वकामदुघे ।यद्यथा मनीषितं कार्यं तन्मम सिद्ध्यतु स्वाहा ।ॐ स्वाहा । ॐ भूः स्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वहा । ॐ महः स्वहा । ॐ जनः स्वहा ।ॐ तपः स्वाहा । ॐ सत्यं स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा । 


यत एवागतं पापं तत्रैव प्रतिगच्छतु स्वाहेत्योम् । अमोघैषा महाविद्या वैष्णवी चापराजिता ॥ ३२॥ स्वयं विष्णुप्रणीता च सिद्धेयं पाठतः सदा । एषा महाबला नाम कथिता तेऽपराजिता ॥ ३३॥ नानया सद्रशी रक्षा। त्रिषु लोकेषु विद्यते । तमोगुणमयी साक्षद्रौद्री शक्तिरियं मता ॥ ३४॥ कृतान्तोऽपि यतो भीतः पादमूले व्यवस्थितः । मूलधारे न्यसेदेतां रात्रावेनं च संस्मरेत् ॥ ३५॥

(४) मंत्र
ध्यान
नीलजीमूतसङ्काशां तडित्कपिलकेशिकाम् । उद्यदादित्यसङ्काशां नेत्रत्रयविराजिताम् ॥ ३६॥
शक्तिं त्रिशूलं शङ्खं च पानपात्रं च विभ्रतीम् । व्याघ्रचर्मपरीधानां किङ्किणीजालमण्डिताम् ॥ ३७॥
धावन्तीं गगनस्यान्तः तादुकाहितपादकाम् । दंष्ट्राकरालवदनां व्यालकुण्डलभूषिताम् ॥ ३८॥
व्यात्तवक्त्रां ललज्जिह्वां भृकुटीकुटिलालकाम् । स्वभक्तद्वेषिणां रक्तं पिबन्तीं पानपात्रतः ॥ ३९॥
सप्तधातून् शोषयन्तीं क्रुरदृष्टया विलोकनात् । त्रिशूलेन च तज्जिह्वां कीलयनतीं मुहुर्मुहः ॥ ४०॥

पाशेन बद्ध्वा तं साधमानवन्तीं तदन्तिके । अर्द्धरात्रस्य समये देवीं धायेन्महाबलाम् ॥ ४१॥ यस्य यस्य वदेन्नाम जपेन्मन्त्रं निशान्तके । तस्य तस्य तथावस्थां कुरुते सापि योगिनी ॥ ४२॥

मंत्र
॥ ॐ बले महाबले असिद्धसाधनी स्वाहा ॥


अमोघां पठति सिद्धां वैष्ण्वीम् ॥ ४३॥ अपराजिताविद्यां ध्यायेत् । दुःस्वप्ने दुरारिष्टे च दुर्निमित्ते तथैव च । व्यवहारे भेवेत्सिद्धिः पठेद्विघ्नोपशान्तये ॥ ४४॥ यदत्र पाठे जगदम्बिके मया विसर्गबिन्द्वऽक्षरहीनमीडितम् । तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रयान्तु मे सङ्कल्पसिद्धिस्तु सदैव जायताम् ॥ ४५॥ तव तत्त्वं न जानामि कीदृशासि महेश्वरि । यादृशासि महादेवी तादृशायै नमो नमः ॥ ४६॥

इस स्तोत्र का विधिवत पाठ करने से सब प्रकार के रोग तथा सब प्रकार के शत्रु और सब बन्ध्या दोष नष्ट होता है । विशेष रूप से मुकदमें में सफलता और राजकीय कार्यों मेंअपराजित रहने के लिये यह पाठ रामबाण है ।

राष्ट्र रक्षा ( चंडी मंत्र )

राष्ट्र रक्षा प्रयोग -1
उग्रवाद विध्वंसक यन्त्र
या चामुंडा यन्त्र


राष्ट्र रक्षा के लियें सबसे उचित प्रयोगों में सबसे उपर और एकमात्र चंडी हैं , एकमात्र चंडी हैं, और एकमात्र चंडी हैं। चंडी के अलावा और कुछ नहीं ।
चंडी मंत्र का मतलब सिर्फ चंडी हैं और कुछ नहीं । चंडी और दुर्गा में अंतर हैं । क्योकि दोनों के वर्ण भिन्न हैं ।

  1. बुधवार को इस प्रयोग को शुरू करें ।
  2. यन्त्र को कार्ड पेपर (मोटे पेपर ) पर पेन से बना लेवें ।
  3. एक और यन्त्र बना कर अपनी शर्ट की जेब में रख लेवें ।
  4. वैष्णो देवी की फोटो लगाएं ।
  5. देवी सिंहवाहिनी की फोटो भी लगाएं ।
  6. घी का दीप पांच मिनिट जलाए ।
  7. किसी और देवता का दर्शन मंत्र चित्र से दूर रहें ।
  8. भारत के सन्दर्भ  में मेरे अनुसार चंडी एकमात्र राष्ट्ररक्षक देवी हैं या मंत्र हैं ।
  9. रविवार तक करें और सोमवार और मंगलवार को छोड़कर वापस करना चाहे तो बुधवार को करें ।
  10. मंगलवार को यह प्रयोग ना करें ।
  11. लाल रंग के वस्त्र पहनें ।
  12. लाल रंग का बल्ब जलाये ।
  13. कठोर ब्रह्मचर्य रखें ।
  14. सोमवार मंगल वार को श्वेत वस्त्र पहनें ।
  15. हरे वस्त्र ना पहनें 
  16. हाथ में कोई हरा रत्न या पन्ना हो तो उसे उतार दे ।
  17. हरे रंग दूर रहें ।
  18. वैष्णव इस विश्व में इसका तुरंत परिणाम टीवी पर पांचवें दिन देखें ।
  19. इस मंत्र से स्त्रियाँ उग्र हो जाती हैं । आप उनसे लड़ें नहीं, घर से कहीं बाहर घूम आयें ।

तीन बार यह बोले (ॐ विश्वदेव्यै:, ॐ:, विश्वदेव्यै ॐ विश्वदेव्यै:, समस्त विश्वे मम ह्रदय, स्थापय:, स्थापय:, स्थापय: मम शरीरे स्थिर:, स्थिर:, स्थिर:, ॐ विश्वात्मने:, ॐ विश्वात्मने:, ॐ विश्वात्मने: नमः)


मंत्र 
॥ ॐ चंडी:ॐ चंडी:ॐ चंडी:ॐ चंडी:ॐ चंडी:ॐ ॥

रोजाना ११ बार या १०८ बार 


मेरा प्रयोग काल नवम्बर २००८ से 

आपके सुविधा के लियें ॥ चण्डिकाहृदयस्तोत्रम् ॥ दिया जा रहा हैं। ( इसकी जरुरत नहीं हैं ।)

॥ ॐ नमः चण्डिकायै ॥

अस्य चण्डिका हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य । मार्क्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, चण्डिका देवता । ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकंअस्य चण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ह्रां इत्यादि षडंग न्यासः ।

ब्रह्मोवाच । अथातस्सं प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथं । चण्डिका हृदयं गुह्यं शृणुष्वैकाग्रमानसः ।

ॐ ऐं ह्रीं क्ळीं, ह्रां, ह्रीं, ह्रूं जय जय चामुण्डे,चण्डिके, त्रिदश, मणिमकुटकोटीर संघट्टित चरणारविन्दे, गायत्री, सावित्री, सरस्वति, महाहिकृताभरणे, भैरवरूप धारिणी, प्रकटित दंष्ट्रोग्रवदने,घोरे, घोराननेज्वल ज्वलज्ज्वाला सहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधिरीकृत दिगन्तरे, सर्वायुध परिपूर्ण्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये, भूतवेताळबृन्दपरिवृते, प्रकन्पित धराधरे, मधुकैटमहिषासुर, धूम्रलोचन चण्डमुण्डरक्तबीज शुंभनिशुंभादि दैत्यनिष्कण्ढके, काळरात्रि, महामाये, शिवे, नित्ये, इन्द्राग्नियमनिरृति वरुणवायु सोमेशान प्रधान शक्ति भूते, ब्रह्माविष्णु शिवस्तुते, त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, रौद्र्यंबिके, ब्राह्मी, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवी शंखिनी वाराहीन्द्राणी चामुण्डा शिवदूति महाकाळि महालक्ष्मी, महासरस्वतीतिस्थिते,नादमध्यस्थिते, महोग्रविषोरगफणामणिघटित मकुटकटकादिरत्न महाज्वालामय पादबाहुदण्डोत्तमांगे, महामहिषोपरि गन्धर्व विद्याधराराधिते, नवरत्ननिधिकोशे तत्त्वस्वरूपे वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके, शब्दस्पर्शरूपरसगन्धादि स्वरूपे, त्वक्चक्षुः श्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते, ॐ ऐंकार ह्रीं कार क्ळीं कारहस्ते आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशयद्रां शोषय शोषय, द्रीं सुकुमारय सुकुमारय, ह्रीं सर्वं प्रवेशय प्रवेशय, त्रैलोक्यवर वर्ण्णिनि समस्त चित्तं वशीकरु वशीकरु मम शत्रून्, शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत् स्वप्न सुषुप्त्य वस्थासु अस्मान् राजचोराग्निजल वात विषभूत-शत्रुमृत्यु-ज्वरादि स्फोटकादि नानारोगेभ्योः नानाभिचारेभ्यो नानापवादेभ्यः परकर्म मन्त्र तन्त्र यन्त्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यङ्मां रक्ष रक्ष, ॐ ऐं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रः, स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रैं स्फ्रौं स्फ्रः - मम सर्व कार्याणि साधय साधय हुं फट् स्वाहा -राज द्वारे श्मशाने वा विवादे शत्रु सङ्कटे । भूताग्नि चोर मद्ध्यस्थे मयि कार्याणि साधय ॥ स्वाहा ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । सर्व काम प्रदं पुंसां भुक्ति मुक्तिं प्रियच्चति ॥

हरी ॐ